सपनों का क़त्लनामा
उस बच्चे शूर्य के नाम, जिसे गलतियों से नहीं, नियमों से मारा गया....
वो रोज़ जाता था उस कमरे तक
जहाँ सलाह लिखी थी दरवाज़े पर
उसे शब्द नहीं
एक इंसान चाहिए था
जो उसकी ख़ामोशी को पढ़े
बिना किसी सवाल के।
पर हम समाज हैं,
हम रंगों के पीछे दौड़ते हैं,
ज़ख़्मों से आँखें मोड़ते हैं।
हम कहते हैं, “बात करो,”
मगर सुनते तब हैं
जब कोई आख़िरी बार बोल चुका होता है।
वो सितारा था,
पर गिरा इसलिए नहीं
कि आसमान में जगह कम थी...
गिरा इसलिए
क्योंकि ज़मीन पर कोई पकड़ने वाला न था।
हम हर बार देर से रोते हैं।
और हर बार
खोने के बाद ही
किसी को “अनमोल” कहते हैं।
वो स्कूल नहीं, सहारा ढूँढने रोज़ वहाँ आया था,
काउंसलिंग के कमरे में नहीं, किसी इंसान के दिल में बसने की चाह लाया था।
पर हम नियमों में उलझे रहे, फ़ॉर्म और फ़ाइलें भरते रहे,
उसकी आँखें बोलती रहीं, और हम बस सुनते रहे… सुनते रहे।
उसकी आँखों में जो शहर था, अब धुँधली-सी सरहदें हैं,
जहाँ सपने थे घर अपने, अब खामोश मकबरे खड़े हैं।
वो लड़का साँस नहीं ....एक तड़पता हुआ सवाल था,
क्यों भविष्य का क़ातिल आज भी “प्रणाली” कहलाए है?
किताबों में जो रोशनी थी, वही अँधेरा बन बैठी,
जहाँ सीखने की आग थी, वहाँ नफ़रत की राख फैली।
वो शरारत भी नहीं थी, वो अपराध भी नहीं था,
पर हर गलती को अदालत की तरह तौलती ये कुर्सियाँ
क्यों इंसानियत से बड़ी हो गईं?
हर खेल का मैदान सूना, हर दोपहर अधूरी है,
जो बचपन दंड बन जाए, वो शिक्षा किसकी मजबूरी है?
वो रोता भी नहीं था, बस टूटती साँसों को पी जाता,
दर्द भी शर्मिंदा था शायद....वो इतना चुपचाप जी जाता।
माँ कहती थी...."बेटा, तेरे पंखों में है फ़लक पूरा",
पर सिस्टम ने कहा - “पहले नियम सीखो, फिर उड़ना।”
क्या उड़ान का हक़ इजाज़त-नामा माँगता है?
क्या हर दफ़ा सपने अधिकार-पत्र से पैदा होते हैं?
-तनु की क़लम से…
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